चंद्रयान 3 इसरो द्वारा सफलतापूर्वक लांच great

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 14 जुलाई, 2023 को दोपहर दो बजकर 35 मिनट पर प्रक्षेपण यान मार्क 3 (Launch Vehicle Mark- LVM 3) द्वारा अपना चंद्रयान-3 मिशन प्रक्षेपित किया

चंद्रयान 3 mission / chandrayan-3

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)

ISRO भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग के तहत एक अंतरिक्ष एजेंसी है, जिसका मुख्यालय कर्नाटक राज्य के बेंगलुरु शहर में है।

इसका लक्ष्य अंतरिक्ष विज्ञान अनुसंधान और ग्रहों की खोज़ को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय विकास के लिये अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना है।

वर्ष 1960 के दशक के दौरान भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के संस्थापक डॉ. विक्रम साराभाई द्वारा भारत में अंतरिक्ष अनुसंधान गतिविधियों की शुरुआत की गई थी।

isro
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INSAT-1B की शुरुआत के साथ वर्ष 1983 में स्थापित, भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह (INSAT) प्रणाली एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे विशाल घरेलू संचार उपग्रह प्रणालियों में से एक है, जिसमें तुल्यकाली कक्षा में नौ परिचालन संचार उपग्रह स्थापित किये गए हैं।

इसने भारत के संचार क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति की शुरुआत की और बाद में भी इस क्रांति को बनाए रखा। INSAT प्रणाली दूरसंचार, टेलीविज़न प्रसारण, उपग्रह समाचार संग्रह, सामाजिक अनुप्रयोगों, मौसम की भविष्यवाणी, आपदा चेतावनी और खोज़  एवं बचाव कार्यों के लिये सेवाएँ प्रदान करती है।

LVM 3 में 3 चरण हैं: 

  • पहला (सबसे निचला चरण) रॉकेट बॉडी के किनारों पर 2 S200 बूस्टर पट्टियों के रूप में है। वे हाइड्रॉक्सिल-टर्मिनेटेड पॉलीब्यूटाडाइन (Hydroxyl-terminated Polybutadiene) नामक ठोस ईंधन का उपयोग करते हैं।
  • दूसरा चरण विकास इंजन द्वारा संचालित होता है, यह तरल ईंधन का उपयोग करता है, जो नाइट्रोजन टेट्रोक्साइड (Nitrogen Tetroxide) या अनसिमेट्रिकल डाइमिथाइलहाइड्रेज़िन (Unsymmetrical Dimethylhydrazine) है।
  • सबसे ऊपरी यानी अंतिम चरण क्रायोजेनिक इंजन द्वारा संचालित होता है। यह द्रवीकृत ऑक्सीजन के साथ द्रवीकृत हाइड्रोजन का उपयोग करता है।

मिशन चंद्रयान-3:

  1. चंद्रयान-3 भारत का तीसरा चंद्र मिशन है, साथ ही यह जुलाई 2019 के चंद्रयान-2 का अनुवर्ती है, जिसका उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर एक रोवर उतारना था।
  2. इसे वर्ष 2023 में श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से LVM 3 द्वारा लॉन्च किया जाना निर्धारित है।
  3. विक्रम लैंडर की विफलता के बाद वर्ष 2024 के लिये जापान के साथ साझेदारी में प्रस्तावित चंद्र ध्रुवीय अन्वेषण मिशन के लिये आवश्यक लैंडिंग क्षमताओं को प्रदर्शित करने हेतु यह मिशन प्रारंभ किया जाएगा।
  4. मिशन में तीन प्रमुख मॉड्यूल होंगे- प्रोपल्शन मॉड्यूल, लैंडर मॉड्यूल और रोवर।
  5. प्रोपल्शन मॉड्यूल लैंडर और रोवर कॉन्फिगरेशन को 100 किमी. तक चंद्र कक्षा में ले जाएगा।
  6. लैंडर में एक निर्दिष्ट चंद्र स्थल पर सॉफ्ट लैंडिंग करने और रोवर को तैनात करने की क्षमता होगी जो अपनी गतिशीलता के दौरान चंद्र सतह का इन-सीटू रासायनिक विश्लेषण करेगा।
भारत का तीसरा चंद्र मिशन चंद्रयान 3 इसरो द्वारा सफलतापूर्वक लांच
भारत का तीसरा चंद्र मिशन चंद्रयान 3 इसरो द्वारा सफलतापूर्वक लांच

अंतरिक्ष के लिये भारत का मानवयुक्त मिशन

  • गगनयान ISRO का एक मिशन है जिसे वर्ष 2023 में प्रमोचित किया जाना है। इस मिशन के तहत:
    • इसमें तीन उड़ानें कक्षा में भेजी जाएंगी।
    • इसमें दो मानव रहित उड़ानें और एक मानव अंतरिक्ष उड़ान होगी।
  • ऑर्बिटल मॉड्यूल कहे जाने वाले गगनयान सिस्टम मॉड्यूल में एक महिला सहित तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्री होंगे।
  • यह 5-7 दिनों के लिये पृथ्वी से 300-400 किलोमीटर की ऊँचाई पर लो अर्थ ऑर्बिट में पृथ्वी की परिक्रमा करेगा।
  • ISRO गगनयान मिशन के दौरान चालक दल की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु वर्ष 2022 में दो मानव रहित ‘एबोर्ट मिशन’ भी संचालित करेगा।

स्क्रैमजेट (सुपरसोनिक दहन रैमजेट) इंजन

अगस्त 2016 में, ISRO ने स्क्रैमजेट (सुपरसोनिक दहन रैमजेट) इंजन का परीक्षण सफलतापूर्वक आयोजित किया है। स्क्रैमजेट इंजन हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में और वायुमंडलीय से ऑक्सीजन को ऑक्सीकारक के रूप में उपयोग करता है। यह परीक्षण मैक 6 की गति पर हाइपरसोनिक उड़ान के साथ ISRO के स्क्रैमजेट इंजन का पहला लघु अवधि का प्रायोगिक परीक्षण था। ISRO का उन्नत प्रौद्योगिकी वाहन (ATV) सुपरसोनिक परिस्थितियों में स्क्रैमजेट इंजनों के परीक्षण के लिये उपयोग किया जाने वाला सॉलिड रॉकेट  बूस्टर था जो एक उन्नत परिज्ञापी रॉकेट भी है। नई प्रणोदन प्रणाली ISRO के पुन: प्रयोज्य प्रमोचन यान का पूरक होगी जिसकी उड़ान अवधि लंबी व अधिक होगी।  भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्द्धन तथा प्रमाणीकरण केंद्र (IN-SPACE):

  • भारतीय अंतरिक्ष अवसंरचना का उपयोग करने के लिये निजी कंपनियों को समान अवसर प्रदान करने हेतु IN-SPACe लॉन्च किया गया था।
  • यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और अंतरिक्ष से संबंधित गतिविधियों में भाग लेने या भारत के अंतरिक्ष संसाधनों का उपयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के बीच एकल-बिंदु इंटरफेस के रूप में कार्य करता है।

न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL):

  • यह अंतरिक्ष विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत वर्ष 2019 में स्थापित भारत सरकार का एक केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र का उद्यम है।
  • यह भारतीय उद्योगों को उच्च प्रौद्योगिकी अंतरिक्ष संबंधी गतिविधियों को शुरू करने में सक्षम बनाने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी के साथ ISRO की वाणिज्यिक शाखा है।
  • इसका मुख्यालय बेंगलुरु में है।

आगामी मिशन:

  • तीन पृथ्वी अवलोकन उपग्रह (EOS):
    • EOS-4 (Risat-1A) और EOS-6 (ओशनसैट-3) दोनों उपग्रहों को ISRO के शक्तिशाली प्रमोचन रॉकेट PSLV का उपयोग करके प्रमोचित किया जाएगा जबकि तीसरा उपग्रह EOS-2 (माइक्रोसैट) स्माल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) की पहली विकासात्मक उड़ान के दौरान प्रमोचित किया जाएगा।  
    • इन उपग्रहों को वर्ष 2022 की पहली तिमाही में प्रमोचित किया जाएगा।
  • शुक्रयान मिशन: ISRO भी शुक्र ग्रह के लिये एक मिशन की योजना बना रहा है, जिसे अस्थायी रूप से शुक्रयान कहा जाता है।
  • स्वयं का अंतरिक्ष स्टेशन: भारत वर्ष 2030 तक अपना स्वयं का अंतरिक्ष स्टेशन प्रमोचित करने की योजना बना रहा है। इस प्रकार भारत भी अमेरिका, रूस और चीन के अंतरिक्ष क्लब के विशिष्ट वर्ग में शामिल हो जाएगा।
  • XpoSat: XpoSat (एक्स-रे ध्रुवणमापी उपग्रह) अंतरिक्ष वेधशाला में ब्रह्मांडीय एक्स-रे का अध्ययन करने के लिये विकसित किया गया।
  • आदित्य L1 मिशन: यह एक भारतीय अंतरिक्ष यान को 1.5 मिलियन किलोमीटर दूर L1 या सूर्य और पृथ्वी के बीच लैग्रेंजियन (Lagrangian) बिंदु तक जाएगा।

ISRO के प्रमोचित यान 

  • PSLV (ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन प्रणाली) और GSLV (भूतुल्यकाली उपग्रह प्रमोचन रॉकेट) ISRO द्वारा विकसित उपग्रह-प्रमोचन यान हैं।
  • PSLV ध्रुवीय कक्षा में “पृथ्वी-अवलोकन” या “सुदूर संवेदन” उपग्रहों को प्रमोचित करता है।
    • सुदूर संवेदन उपग्रहों को सूर्य-तुल्यकाली ध्रुवीय कक्षाओं में प्रमोचित करने के अतिरिक्त, PSLV का उपयोग लगभग 1400 किलोग्राम के कम द्रव्यमान वाले उपग्रहों को दीर्घवृत्ताकार भूतुल्यकाली स्थानांतरण कक्षा (GTO) में प्रमोचित करने के लिये भी किया जाता है।
    • यह एक चार चरणों वाला प्रमोचन यान है जिसमें पहले और तीसरे चरण में ठोस ईंधन का उपयोग किया जाता है तथा दूसरे और चौथे चरण में तरल ईंधन का उपयोग किया जाता है। थ्रस्ट बढ़ाने के लिये PSLV के साथ स्ट्रैप-ऑन मोटर्स का भी इस्तेमाल किया गया।
    • PSLV को इसके विभिन्न संस्करणों जैसे कोर-एलोन संस्करण (PSLV-CA) या PSLV-XL वेरिएंट में वर्गीकृत किया गया है।
  • GSLV संचार-उपग्रहों को लगभग 36000 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित भूतुल्यकाली स्थानांतरण कक्षा (GTO) तक पहुँचाता है।
    • GSLV के दो संस्करण ISRO द्वारा विकसित किये गए हैं और तीसरे संस्करण का परीक्षण चरण चल रहा है। पहले संस्करण, GSLV Mk-II में GTO के लिये 2,500 किलोग्राम तक के भार के उपग्रहों को प्रमोचित करने की क्षमता है।
    • GSLV MK-II एक तीन चरणों वाला यान है जिसके पहले चरण में ठोस ईंधन का उपयोग किया जाता है, दूसरे चरण में तरल ईंधन का उपयोग किया जाता है और तीसरे चरण को क्रायोजेनिक अपर स्टेज कहा जाता है, जिसमें क्रायोजेनिक इंजन का उपयोग होता है।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के सामने चुनौतियाँ और अवसर 

  • भारत अभी भी विशाल विकासात्मक और सुरक्षा चिंताओं के साथ एक विकासशील देश है। इस संदर्भ में अंतरिक्ष मिशनों के आवंटन को सही ठहराना बहुत जटिल है जिसका विकास पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ता है।
  • MOM के सफल प्रमोचन और चंद्रमा पर एक नियोजित रोवर ने निश्चित रूप से भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को बढ़ावा दिया है। लेकिन उपग्रहों पर भारत की निर्भरता ने सैन्य भेद्यता उत्पन्न की है।
  • वर्ष 2007 में चीन द्वारा परीक्षण की गई एक उपग्रह-रोधी मिसाइल (ASAT) ने भी अंतरिक्ष कार्यक्रम में धीमी गति से चलने वाली हथियारों की दौड़ के खतरे को बढ़ा दिया है।
  • DRDO मिसाइल रक्षा के विकास पर कार्य कर रहा है लेकिन यह तेज़ी से संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य देशों के साथ साझेदारी करना चाह रहा है।
  • चीन ने क्रमशः वर्ष 2011 और 2012 में पाकिस्तान तथा श्रीलंका के लिये उपग्रह प्रमोचित किये हैं। यह अंतरिक्ष सहयोग चीन के लिये दक्षिण एशियाई देशों में पैठ बनाने का एक और रास्ता बना सकता है।
  • इस दशक की शुरुआत में भारत अंतरिक्ष क्षेत्र के लिये एक आचार संहिता बनाने के यूरोपीय संघ के प्रयासों की अत्यधिक आलोचना करता था, लेकिन पिछले वर्षों में यह विशेष रूप से आचार संहिता और अन्य सुरक्षा उपायों पर चर्चा करने में संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है। 
  • भारत का मानना है कि अंतरिक्ष क्षेत्र और साइबर क्षमताओं के एकीकरण पर निर्भरता भविष्य के संघर्षों में ही बढ़ेगी। लेकिन अब समुद्री क्षेत्र से परे, भारत कई अन्य उपग्रह-आधारित संचार और डेटा सेवाओं के लिये विदेशी साझेदारों पर निर्भर रहा है। उदाहरण के लिये, यह अंतरिक्ष संचार के लिये NASA पर निर्भर है।
  • निजीकरण भी भारत को अपनी प्रमोचन क्षमता बढ़ाने की अनुमति दे सकता है, जो वर्तमान में प्रति वर्ष चार से पाँच है जबकि चीन औसतन बीस या इतने ही प्रमोचन करता है। निजी क्षेत्र की भागीदारी को निर्देशित करने हेतु भारत के पास कोई स्पष्ट अंतरिक्ष नीति नहीं है।
  • ISRO की उपग्रह प्रमोचित करने की क्षमता पर आंतरिक बाधाएँ भी हैं।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा जून 2018 में “अंतरिक्ष बल” या अमेरिकी सशस्त्र बलों की छठी शाखा के निर्माण की घोषणा ने भारत सहित कई देशों को चिंतित किया है। जबकि भारत आधिकारिक रूप से PAROS, या अंतरिक्ष क्षेत्र में हथियारों की प्रतिस्पर्द्धा को रोकने के लिये प्रतिबद्ध है, फिर भी इस तरह की योजनाओं के लिये एक विश्वसनीय आधिकारिक प्रतिक्रिया तैयार करना अभी बाकी है। भारत को अभी तक अपनी स्वयं की एक विश्वसनीय अंतरिक्ष कमान स्थापित करनी है।
  • इस संदर्भ में चीन की प्रतिक्रिया उसकी प्रतीत होने वाली मौन आधिकारिक प्रतिक्रिया से कहीं अधिक सुदृढ़ हो सकती है और उसके पास एक दुर्जेय अंतरिक्ष सैन्य कार्यक्रम है जो वर्तमान में भारतीय क्षमताओं से कहीं अधिक है।
  • एलोन मस्क और रिचर्ड ब्रैनसन जैसे विश्व स्तर के उद्यमियों ने अंतरिक्ष गतिविधियों को स्वतंत्र लाभदायक वाणिज्यिक उद्यम के रूप में परिवर्तित करना शुरू किया जिसे नई अंतरिक्ष क्रांति कहा जा सकता है।

अब अधिक संरचित दृष्टिकोण का समय आ गया है जो भारत में युवा प्रतिभाओं के बेहतर उद्भवन को सक्षम बनाता है। सौभाग्य से, एंट्रिक्स ऐसे विचारों के लिये खुला है। विभिन्न नीतियों और अधिनियमों को बदलने  या प्रतिबंधात्मक बनाने के बजाय सक्षम बनाने की आवश्यकता है।

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